राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 65 of 92

(राग धनाश्री) वृंदावन मोकों अति भावत। सुनहु सखा तुम सुबल, श्रीदामा, ब्रज तैं बन गौ चारन आवत॥ [1] कामधेनु सुरतरु सुख जितने, रमा सहित बैकुंठ भुलावत। इहिं बृंदाबन, इहिं जमुना-तट, ये सुरभी अति सुखद चरावत॥ [2] पुनि-पुनि कहत स्याम श्रीमुख सौं, तुम मेरैं मन अतिहिं सुहावत। ‘सूरदास’ सुनि ग्वाल चकित भए ,यह लीला हरि प्रगट दिखावत॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर (राग धनश्री) वृन्दावन मोकोन अति भवत्। सुनो सखी तुम बलशाली हो श्रीदामा, ब्रज गाय के चरणों जैसा हो गया है। [1] कामधेनु सुरतरु सम सुखी, राम सहित भूला वैकुण्ठ। यहाँ बृंदाबन, यहाँ जमुना का किनारा, यह सुगंध अति सुखद है.. [2] पुनि-पुनि कहते हैं श्याम श्रीमुख सौन, तुम मेरे मन को अति सुखदायक। 'सूरदास' ग्वाला सुनकर आश्चर्यचकित हो गया, यह लीला हरि का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
मन रे श्याम सों कर हेतहम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति