यह सब जानों भक्त के लच्छन

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 68 of 92

(राग नट) यह सब जानों भक्त के लच्छन। कोऊ निन्दो कोऊ बन्दो, कोऊ मरि लेहु धन गच्छन॥ [1] कोऊ एक आनि लगावत चन्दन, डारि धूरि कोऊ देत है भच्छन। कोऊ कहे मूरख महा अधर्मी, कोऊ कहै यह बड़ौ विलच्छन॥ [2] भली बुरी मन में नहीं आवैं, कृष्ण चरन रति टरे न एक छिन। 'सूर' सुख दुःख जिनको नहिं, ब्यापै तिनको गिरधर मिलै तत्छिन॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर (राग नाता) ये सब जनाना भक्त की इच्छाएं हैं। कुओ निंदो कुओ बंदो, कुओ मारी लेहु धन गच्छन.. [1] कुओ एक आणि लगावत चंदन, डारि धुरी कुओ देता है बच्चन। मूर्ख क्या कहे, महात्मा क्या कहे, ये बेदुइन क्या कहें.. [2] अच्छे-बुरे का विचार मन में न आये, एक तारा भी कृष्ण के चरण स्पर्श न करे। 'सुरा' जिनको न सुख है न दुःख, वे अपने वश में होकर विवाह करते हैं.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीतिऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि