ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 69 of 92

(राग सारंग) ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि । ग्वारनि के पनवारे चुनि-चुनि, उदर भरीजै सीथिनि॥ [1] पैंड़े के सब बृच्छ बिराजत, छाया परम पुनीतनि । कुंज-कुंज-प्रति लोटि-लोटि, ब्रज-रज लागै रँग-रीतनि॥ [2] निसि दिन निरखि जसोदा-नंदन, अरु जमुना-जल पीतनि। परसत सूर होत मन पावन, दरसन करत अतीतनि॥ [3] - श्री सूरदास, सूरसागर (1108) (राग सारंगा) अइसैन बसै ब्रज की बिथिनी। गुआरानी के पनवारे चुनी-चुनी, उदर भरिजै सीथिनी..[1] दर्दे सब बृच्छ बिरजात, छाया परम पुनितानि। कुंज-कुंज-प्रति लोटी-लोटी, ब्रज-रज लागै रंग-रीतानि..[2] निशदिन निरखि जसोदा-नंदन, अरु जमुना-जल पाटनी। परसत सुर होत मन पवन, दर्शन करत अतितानि.. [3] - श्री सूरदास, सूरसागर (1108)
यह सब जानों भक्त के लच्छनऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि