ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 71 of 92
(राग- कल्यान)
बृंदाबन खेलत हरि होरी।
बाजत ताल मृदंग झाँझ डफ, नंद-लला बृषभानु-किसोरी॥ [1]
हौँ अपनैं गृह तैं निकसी सखि, सास की त्रास ननद की चोरी।
और सखी सब छाँड़ि स्याम मो, कर मरोरि पहुँची गहि तोरी॥ [2]
स्याम-बरन अति सुंदर साँवरौ, कनक-बदन राधे-तनु गोरी।
सूरदास के प्रभु दोऊ राजत, पारस कंचन की सी जोरी॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
(राग- कल्याण) बृंदाबन हरि होरी बजाते हैं। बाजत ताल, मृदंग, झांझ डफ, नंद-लाला, बृषभानु-किशोरी.. [1] मैं अपने ही घर में हूं, मैं किसी की सहेली हूं, सास-ननद की बेटी हूं। और मेरे मित्र, सब श्लोक हैं स्यामा मो, कर मरोरि पहुँचहि गह तोरी..[2] श्यामा-बरन अति सुन्दर, कनक-बदन राधे-तनु सुन्दर। सूरदास के प्रभु युगल रजत, पारस कंचन की जोरी.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर