ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 72 of 92

चरन कमल बन्दौ हरि राई। जाकी कृपा पन्गु गिर लंघै, अन्धे को सब कुछ दरसाई॥ [1] बहिरौ सुनै मूक पुनि बोलै, रन्क चलै सिर छत्र धराई। 'सूरदास' स्वामी करुणामय, बार-बार बन्दौ तिहि पाई॥ [2] - श्री सूरदास जी, सूरसागर, विनय तथा भक्ति (1) चरण कमल बंदौ हरि रे। जब अपंग पक्ष से बाहर हो जाता है, तो अंधा व्यक्ति हर चीज से डरता है। [1] जब बहिरू ने उसके मुख से ये शब्द सुने तो वह सिर पर छाता लेकर चलने लगा। 'सूरदास' स्वामी दयालु, बारंबार बंदौ तिहि पै.. [2] - श्री सूरदास जी, सूरसागर, विनय और भक्ति (1)
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