ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 73 of 92
धनि यह वृन्दावन की रेनु। [1]
नंद-किसोर चरावत गैयाँ, मुखहिं बजावत बेनु॥ [2]
मन-मोहन को ध्यान धरै जिय, अति सुख पावत चैनु। [3]
चलत कहाँ मन और पुरी तन, जहँ कछु लैन न दैनु॥ [4]
इहाँ रहहु जहँ जूठनि पावहु, बृजवासिनि कै ऐनु। [5]
सूरदास ह्याँ की सरवरि नहि, कल्पवृच्छ सुर-धैनु॥ [6]
- श्री सूरदास जी, सूरसागर, वृन्दावन लीला (14)
वृन्दावन की यह रेनू धनी है। [1]. [3] मेरा मन और मेरा पूरा शरीर कहां जाए, जहां मुझे कुछ भी न मिले... [4] मैं यहीं रहूंगी जहां मैं खुद को, बृजवासिनी की आत्मा को पा सकूं। [5] सूरदास नहीं हयण की सरवरी, कल्पवृच्छ सूर-धैनु.. [6] - श्री सूरदास जी, सूरसागर, वृन्दावन लीला (14)