दोऊ राजत स्यामा स्याम

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 75 of 92

(राग देवगंधार) दोऊ राजत स्यामा स्याम। ब्रज-जुवती-मंडली बिराजति, देखतिं सुरगन-बाम॥ [1] धन्य धन्य वृंदावन कौ सुख, सुरपुर कौनैं काम। धनि बृषभानु-सुता, धनि मोहन, धनि गोपनि कौ नाम॥ [2] इनकी को दासी सरि ह्वै है, धन्य सरद की जाम। कैसेहुँ ‘सूर’ जनम ब्रज पावैं, यह सुख नहिं तिहुँ धाम॥ [3] - श्री सूरदास, सूरसागर (1696) (राग देवगंधार) युगल रजत स्याम स्याम। ब्रज-जुवति-मण्डली बिराजति, देखतिन सुरगण-बम।।[1] धन्य धन्य वृन्दावन, जो सुख का स्रोत है, जो काम है। जिनके नाम हैं - धनि बृषभानु-सुता, धनि मोहन, धनि गोपाणी.. [2] सब दासियाँ हैं, धन्य सारदा की जाम। 'सूर' कैसे जन्में ब्रज में, ये सुख तीन धाम में नहीं... [3] - श्री सूरदास, सूरसागर (1696)
धन्य धन्य वृषभानु दुलारीजौ हम भले बुरे तौ तेरे