जो सुख ब्रज में एक घरी
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 77 of 92
(राग रामकली)
जो सुख ब्रज में एक घरी।
सो सुख तीनि लोक में नाहीं, धनि यह घोष-पुरी॥ [1]
अष्ठ सिद्धि नवनिधि कर जोरे, द्वारैं रहतिं खरी।
सिव सनकादि - सुकादि अगोचर, ते अवतार हरी॥ [2]
धन्य-धन्य बड़भागिनि जसुमति, निगमनि सही परी।
ऐसैं सूरदास के प्रभु कौं, लीन्हों अंक भरी॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर (687)
(राग रामकली) जो सुख घर ब्रज। तो ख़ुशी किसी छोटी सी दुनिया के लिए नहीं, बल्कि एक अमीर आदमी के लिए है। शिव सनकादि - सुकादि अगोचर, ते अवतार हरि। [2] धन्य-धन्य महमारी जसुमति, निगमनि सहपरि। अइसैन सूरदास के भगवान कौन, लिन्होन अनक भारी.. [3] - श्री सूरदास, सूरसागर (687)