ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 78 of 92
(राग सारंग)
जो सुख होत गोपालहिं गायैं।
सो न होत जप-तप के कीनैं, कोटिक तीरथ नहायैं॥ [1]
दिये लेत नहिं चारि पदारथ, चरन कमल चित लायैं।
तीन लोक तृन सम करि लेखत, नंदनंदन उर आयैं॥ [2]
वंशीवट, वृन्दावन, यमुना तजि बैकुंठ न जायैं।
सूरदास हरि को सुमिरन करि, बहुरि न भवजल आवैं॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
(राग सारंगा) जिसे सुख गोपाल ने गाया है। अत: मैंने जप-तप छोड़कर कोटिक तीरथ में स्नान कर लिया। [1] मैं लेटा नहीं, चरण कमल लाये। तीनों लोक एक समान, आनंद लेके आओ... [2] वंशीवट, वृन्दावन, यमुना वैकुण्ठ में मत जाओ। सूरदास हरि सुमिरन, बहुरि न भवजल आयें। [3] - श्री सूरदास, सूरसागर