ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 82 of 92

(राग सारंग) मेरो मन अनत कहां सुख पावै। [1] जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥ [2] कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै। [3] परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥ [4] जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै। [5] सूरदास, प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥ [6] - श्री सूरदास, सूरसागर, विनय तथा भक्ति (25) (राग सारंगा) मेरे मन को शाश्वत सुख कहाँ मिलेगा? [1] जैसे जब जहाज उड़ता है तो एक पक्षी जहाज के पास आ जाता है.. [2] जब कमल उड़ने लगता है तो वह महात्मा और भगवान का ध्यान करता है। [3] परम गंगा कोण छन्दै पियासो दुर्मति कूप खामवै। [4] यदि तुमने अमृत चख लिया है तो करेले का फल क्यों खाओगे? [5] सूरदास, प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै.. [6] - श्री सूरदास, सूरसागर, विनय और भक्ति (25)
जौ हम भले बुरे तौ तेरेसब तजि भजिऐ नंद कुमार