सब तजि भजिऐ नंद कुमार
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 83 of 92
(राग केदारौ)
प्यारी, प्रीतम आरति करतु।
तुम्हरे कारन कुमरि राधिका, मेरे पांयनि परतु॥ [1]
वरही मुकट लुठन अवनी पर, नाहिंन निज भुज भरतु।
बार बार रहटि के घट ज्यौं, भरि भरि लोचन ढरतु॥ [2]
अति आधीन मीन ज्यौं जल बिनु, नाहिंन धीरज धरतु।
'सूर' सुजान सखी सुन तुम विनु ,मनमथ पावक जरतु॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
(राग केदारौ) प्रियतम आरती करो। तुम्हारे कारण कुमारी राधिका मेरी प्रिय पत्नी है। [1] वाराहि मुक्ता लूथन अवनि पर, नहिन्न निज भुज भरतु। ज़मीन पानी से भरी है, ज़मीन पानी से भरी है। 'सूर' सुजन सखि सुनो विनु, मन्मथ पावक जरातु।।[3] - श्री सूरदास, सूरसागर