ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 89 of 92

(राग सारंग) स्यामा तू अति स्यामहि भावै। बैठत-उठत, चलत, गौ चरत, तेरौ लीला गावै॥ [1] पीत बरन लखि पीत बसन उर, पीत धातु अंग लावै। चन्द्राननि सुनि, मोर चन्द्रिका, माथै मुकुट बनावै॥ [2] अति अनुरागि सैनि संभ्रम मिलि, संग परम सुख पावै। बिछुरत तोहिं क़्वसि राधा कहि, कुज-कुंज प्रति धावै॥ [3] तेरौ चित्र लिखे, अरु निरखै, बासर-बिरह नसावै। सूरदास रस-रासि-रसिक सौ, अन्तर क्यौ करि आवै॥ [4] - श्री सूरदास, सूरसागर (राग सारंग) स्याम तु अति स्यामहि भवै। बैठा-उठात, चलत, गौ चरत, तेरौ लीला गावै.. [1] पीत बरन लखि पीत बसन उर, पीत धातु अंग लावै। चंद्रनानी सुनो मोर चंद्रिका, मेरे माथे पर मुकुट बनाओ। [2] अति प्रिय सैनी परम सुख पावे, संग परम सुख पावे। राधा कहां है, जब मैं बिछुड़ जाती हूं, कोने-कोने में दौड़ती हूं.. [3] मैं तेरी तस्वीर लिखती हूं, अरु निरखई, बसरा-बिरह नसावै। सूरदास रस-रसी-रसिक सौं, क्यों करूं भेद.. [4] - श्री सूरदास, सूरसागर
सब तजि भजिऐ नंद कुमारसुने री मैंने निरबल के बल राम