और कहाँ ते सुमरिये

Utkntha Madhuri — श्री माधुरी दास

Verse 4 of 15

दसन खँडित वीरी रुचिर, दैहैं निकट बुलाय। कुंवरि आपने कंठ को, हार कंठ पहराय॥ - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (149) दासन खंडित वीरी रुचिर, दहेन निचट कॉल मी। एक कुंवारी अपने कंठ की, हर कंठ की रक्षा करती है.. - श्री माधुरी दास, उत्कंठ माधुरी (149)
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