और कहाँ ते सुमरिये

Utkntha Madhuri — श्री माधुरी दास

Verse 6 of 15

जो मोसों मोसी करौ, नाहीं कछु मोहि ठौर। तुम हो तैसी कीजिए, अहो रसिक सिर मौर॥ - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (76) तुम ऋतुओं में जो कुछ भी करो, तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है। तुम हो तैसी किजी, अहो रसिक सर मौर.. - श्री माधुरी दास, उत्कंठ माधुरी (76)
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