मन नग ताको दीजिये जो प्रेम पारखी होय
Vallabh Sakhi — गोस्वामी श्री हरिराय
Verse 12 of 18
रतन खचित कंचन महा, श्री वृदावन की भूमि।
कल्पवृक्ष से द्रुम रहे, फल फूलन करि झूमि॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (80)
रतन खचित कंचन महा, भूमि श्री वृदावन। कल्पवृक्षों के डमरू बने रहें, वे पुष्पित-पल्लवित रहें.. - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (80)