अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि
Vinay Kundaliyan — श्री अलबेली अलि
Verse 8 of 11
लाभ-हानि जानो न कछु, कौन मान-अभिमान।
बदन कमल-मकरंद रस, करो नैंन-मग पान॥ [1]
करो नैंन-मग-पान, सुधा अंग-अंग भरयौ जाके।
घूमत रहौं दिन रैंनि, मनौं मादिक मद-छाके॥ [2]
निरषि निरषि नव रूप, कुंवरि बर बेस किशोरी।
बढ़त रहे चित चाय चौंप, जयौं त्रषत चकोरी॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (19)
लाभ-हानि किसे मालूम, अभिमान की परवाह किसे। तन कमल-अमृत रस, करो नैना-मग पान.. [1] करो नैना-मग-पान, सुधा अंग-अंग भरयौ जे.के. बरसात के दिन बीत रहे हैं, मैं दीवानी सी लग रही हूं.. [2] निरसी निरसी नया रूप, कुंवारी और असहाय किशोरी। चित चाय चॉम्प बढ़ता जाता है, जैसे कासनी कुचल जाती है.. [3] - श्री अलबेली अली, विनय कुण्डलिया (19)