लालहिं बस करनी, मदन मन हरनी
Vitthal Vipul Vani — श्री विट्ठल विपुल देव
Verse 4 of 19
(राग बिलावल)
लालहिं बस करनी, मदन मन हरनी,
मल्हकि पग धरनी, उरज उदित री। [1]
हेमलता की फरनी, श्रमजल की झरनी,
निकट सुता तरनी, बदन मुदित री॥ [2]
रूप सुधा की भरनी, मोपै क्यों आवै बरनी,
पिय टकटरनी, तृषित छुधित री। [3]
रस बस कै बरनी, विपुल प्रेम परनी,
‘श्रीबीठल’ कुंज घरनी, बिहारी बुधित री॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (8)
(राग बिलावाला) ललहिं बस करनी, मदन मन हरणी, महकी पग धरणी, उरज उदित री। [1]. [3] रस बस काई बराणी, विपुल प्रेम पराणी, 'श्रीबिथला' कुंज घराणी, बिहारी बुधित री.. [4] - श्री विट्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (8)