प्रातहीं किसोर जोरि कुंज-केलिनी

Vitthal Vipul Vani — श्री विट्ठल विपुल देव

Verse 6 of 19

(राग भैरों) प्रातहीं किसोर जोरि कुंज-केलिनी। [1] अंग-अंग गुन-तरंग गौर-स्याम रूप-रासि, मदन-केलि सुरत-सिंधु पुलकि-झेलिनी॥ [2] तरनि नंदिनी-सुतीर, गावत पिक-भृङ्ग-कीर, त्रिगुन मरुत-माधुरी, श्रमंबु पेलिनी। [3] बरु बिहार-राजनी, सु नूपुरादि बाजनी, श्रीबीठलविपुल बारनें भुज कंठ-मेलिनी॥ [4] - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (7) (राग भैरों) प्रथम किसोर जोरी कुंजा-केलिनी। [1] अंग-अंग गुण-तरंग गौरा-स्याम रूप-रासी, मदन-केलि सुरता-सिंधु पुलकी-झेलिनी.. [2] तारणी नंदिनी-सुतिर, गावत पिका-भृंगगा-कीर, त्रिगुण मारुता-माधुरी, श्रमणबु पेलिनी। (7)
लाल करत तेरे गुन गानैंप्यारी तेरी चाल चितवन बाँकी