ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि
Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य
Verse 11 of 14
उपमा वृंदाविपिन की, देवे को नहिं ओक।
जाकी सुखमा लेश तें, सर्वोपरि गोलोक॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (27)
वृन्दाविपिन से तुलना देवे को शोभा नहीं देती। जाकी सुखमा लेश तेन, सर्वोपरी गोलोक.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (27)