ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि

Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य

Verse 12 of 14

ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि। सो आवत नहिं नैंकहुँ, ध्यान मात्र उर मांहि॥ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (33) ब्रह्मादिक चेतन रहता है, वृन्दावन रज नित्य रहता है। तो मैं आँखों से नहीं आता, बस तेरा ही ध्यान करता हूँ.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (33)
ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहिब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि