ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि

Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य

Verse 4 of 14

जो कदाचितन ना बसै, तौ निज मनहिं बसाय। यामें नाहिन झूठ कछु, कहत महत कविराय॥ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (46) न भी बसे तो मन में बस जाती है। यामेन नहि झूठ कुछु, कहत महत् कविराय.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (46)
ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहिब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि