ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि
Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य
Verse 5 of 14
कोटि कोटि सुकदेव से, कोटि कोटि जयदेव।
नित नव गुण वर्णन करैं, तऊ नहिं पावहिं भेव॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (56)
कोटि-कोटि शुकदेव से, कोटि-कोटि जयदेव से। यदि मैं नित नये गुणों का वर्णन करूँ तो उन्हें ढूँढ़ नहीं पाऊँगा.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (56)