ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि

Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य

Verse 6 of 14

कोटि कोटि वैकुंठ की, प्रभुताइ धौं कौन। ऐसो वृंदाविपिन है, रसिकन कौ रस भौन॥ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (28) करोड़ों वैकुंठों के भगवान कौन हैं? ऐसो वृन्दाविपिन है, रसिकन कौ रस भौंह.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (28)
ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहिब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि