ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि
Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य
Verse 7 of 14
कोटिक तीरथ न्हाइप, कोटिक करौ उपाव।
पैवो नाहिंन विपिन सुख, बिना सहचरी भाव॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (72)
कोटिक तीरथ नाहप, कोटिक करौ उपव। पैवो नहिंना विपीन सुखा, भव बिन संगी.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (72)