ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि
Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य
Verse 8 of 14
श्री वृंदावन माधुरी, कैसे कैं कहि जाइ।
शेष सहस्त्र मुख कहि थके, अजहुँ पार न पाइ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (26)
श्री वृन्दावन माधुरी, कैसे बोलें जय। बाकी हजार चेहरे थक गए हैं, लेकिन मैं उन पर काबू नहीं पा सकता.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (26)