ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि
Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य
Verse 9 of 14
श्री वृंदावन महातम, समझि लेहु मन मित्त।
मंगलरूपी जानिकैं, श्रीपति वंदत नित्त॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (24)
श्री वृन्दावन महत्वपूर्ण है, इसे समझो और अपने मन को जाने दो। मंगलरूपी जनिकैन, श्रीपति वंदत नित्ता.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (24)