रूप गुन गंस के हंस अरु मोर

Vrindavan Sata — श्री अलबेली अलि

Verse 3 of 9

(कवित्त) भजन रस सार कौ सार रस विपिन कौ, बिना राज परस कहो कौन पायौ। [1] महेस ओर सेस ब्रह्मादिकन अगम अति, नेति कहि नेति कहि वेद गायौ॥ [2] प्रेम रस रंग की लहरि जहाँ उठत दिन, फूल, फल, पात रस रूप छायो। [3] प्रान सम जान अलबेली बृंदाबिपिन, कुंवरि हित करन चित चरन लायो॥ [4] - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (88) (कविता) भजन रस सार कौ सार रस विपिन कौ, बिना राज पारस कहो कौन प्यु। [1]. [3] कुँवारी के कल्याणार्थ अलबेली बृंदाबिपिन चरण लाये जीवन-रूपी लोग.. [4] - श्री अलबेली अली, वृन्दावन सत् (88)
अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अतिरूप गुन गंस के हंस अरु मोर